ख्वाइश हुई की जानलूँ तक़ल्लुफ़ ए ज़िन्दगी,
फिर उनकी तहक़ीक़ याद आई,
क्या हक़ था मुझे फ़िक्र करने का, क्योंकि दोस्ती तो आजकल महज़ नाम की भी होती है।।

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