अरसा हो गया तुझे दूर गये हुए लेकिन,
तेरी उस झलक पर आज भी मरता हूँ;

लाखों फूलों बीच बाग में बैठा हूँ,
तेरी उस भीनी सी खुशबू पे मरता हूँ;

कितना भी चमकीला हो वो चांद आसमां में,
तेरी उस चेहरे की चांदनी पे मरता हूँ;

छा जाए जो मेघ ढक भी ले आसमां को,
तेरी उन ज़ुल्फों की घटाओं पे मरता हूँ;

सरगम से सुरीला संगीत भी सुनकर,
तेरे उन लव्जों के ताल पर मरता हूँ;

कितना भी फैला ले काली रात अपना काजल,
तेरी श्याम से श्यामल आखों पे मरता हूँ;

झील में खिले उस कमल से मन मोहक,
तेरी उस खिलखिलाती मुस्कुराहट पे मरता हूँ;

लहराती बलखाती हवा से भी चंचल,
तेरी उन मोहिनी अदाओं पे मरता हूँ;

अरसा हो गया तुझे दूर गये हुए लेकिन,
तेरी उस झलक पर आज भी मरता हूँ||

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